होली का त्यौहार

होली का त्यौहार

हिरण्यकश्यप एक असुर था । महर्षि कश्यप और दिति का ज्येष्ठ पुत्र था और उसका छोटा भाई हिरण्याक्ष था। उसने ब्रह्मा जी से वरदान माँगा था।  उसे न कोई मनुष्य न पशु मार सके। न दिन में न रात में ,न अस्त्र से न शस्त्र से न घर के अंदर न बाहर। वह पूरी पृथ्वी पर राज करना चाहता था । वह अपने आप को भगवान कहलाने  के लिए सब पर जोर जबरदस्ती करता था । उसने धरती से  भगवान विष्णु जी के भक्त को समाप्त करना शुरू किया। जहाँ  भी विष्णु जी की पूजा होती ,वहाँ वह  अपने असुरों को भेज कर सारे ऋषि मुनियों को मरवा देता था। उसकी पत्नी  कयाधु  जम्भ नामक दानव की पुत्री  थी । जो विष्णु भगवान की परम भक्त थी । पर  हिरण्यकश्यप के डर की वजह से ,वह विष्णु भगवान की पूजा छिप  कर करती थी । क्योकि  वह जानती थी। जब हिरण्यकश्यप को पता चलेगा कि  वह भी विष्णु भगवान की भक्त है। तो हिरण्यकश्यप  वध  कर देगा। जब कयाधु  गर्भ से  थी । तो उसकी इच्छा विष्णु भगवान की भक्ति करने को हुई। हिरण्यकश्यप के डर की वजह से वह किसी जंगल में जाने की इच्छा प्रकट किया।  वह अपने सब दास दासियो के साथ जंगल में गई। जहाँ  नारद मुनि का आश्रम था। नारद मुनि विष्णु भगवान की भक्ति में लीन थे। चारों तरफ भगवान नारायण का धुन चल रहा था।  कयाधु  नारद मुनि के सम्मुख बैठ गई। और नारायण नाम का जाप करने लगी। नारद मुनि ने जब आंखें खोली। तो उन्होंने अपने सम्मुख का कयाधु  को पाया। कयाधु  को बोला तुम हिरणकश्यप की पत्नी हो। तुम्हें डर नहीं लग रहा। कि तुम विष्णु भगवान की भक्ति कर रही हो।  कयाधु ने कहा डर के वजह से ही , मैं जंगल में आकर विष्णु भगवान की भक्ति कर रही हूँ। नारद मुनि ने कहा कि जब भगवान की भक्ति कर रही हो। तो तुम्हें हिरण्यकश्यप नहीं डरना चाहिए। कयाधु  ने कहा नहीं मुझे हिरण्यकश्यप की बात माननी ही चाहिए। क्योंकि वह उसके पति है परंतु वह भगवान के प्रति अपनी भक्ति को कम नहीं कर सकती है।  इसलिए वह जंगल में आकर  भगवान की भक्ति कर लेती है। और वह नारद मुनि को हाथ जोड़कर ,वह वापस हिरण्यकश्यप के महल में आ जाती है।  जब भक्त प्रहलाद का जन्म होता है। तो हिरण्यकश्यप खुश होता है। परंतु धीरे-धीरे हिरण्यकश्यप को पता चलने लगता है कि उसका पुत्र भी भगवान विष्णु का भक्त है। जो भगवान विष्णु के भक्त को वह समाप्त कर रहा था। चाल उल्टी पड़ गई। भगवान विष्णु का भक्त तो उसके घर में ही जन्म ले चुका था। परंतु वह भक्त प्रहलाद से बाल अवस्था के कारण कुछ बोला नहीं। परंतु जैसे-जैसे वह बड़े होते गए। 6 वर्ष के आते-आते वह विष्णु भगवान के परम भक्त हो गए। वह छोटी सी अल्प आयु में ही घंटो घंटो  बैठकर विष्णु भगवान का जाप  किया करते थे।  यह खबर हिरण्यकश्यप तक पहुंची गई। कि  उनका पुत्र तो विष्णु भगवान के भक्ति को नहीं छोड़ रहा है।  अब हिरण्यकश्यप इस बात पर काफी सोच विचार और मंथन किया। कि भक्त  प्रहलाद को समझाना मुश्किल है। इसे मृत्यु ही दे दिया जाए। आखिर में हिरण्यकश्यप ने भक्त प्रह्लाद को  पहाड़ों के ऊपर से फेंक दिया। वे नारायण नारायण का जाप करते रहे। और भगवान  विष्णु  की भक्ति ने प्रहलाद जी को बचा लिया। जब भगवान जब भक्त प्रहलाद पहाड़ों से फेकने पर नहीं मरे।  तब हिरण्यकश्यप मतवाले हाथियों के सामने भक्त प्रहलाद को फेंक दिया। जिससे हाथी के पैरों के नीचे कुचल कर मर जाए।  परंतु भक्त प्रहलाद तब भी नहीं मरे।  भक्त प्रहलाद को मारने  के लिए हिरण्यकश्यप बड़ी से बड़ी चाले चली।  षड्यंत्र  किये। परंतु भक्त प्रहलाद का बाल बाका ना कर सके।  आखिर में परेशान होकर हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को सूचना पहुँचा  दिया।  कि वह उसके पुत्र को आग  में लेकर बैठ जाए।  और उसका पुत्र जल जाए। क्योंकि होलिका को वरदान था। कि उसको अग्नि जला नहीं सकती है । होलीका भक्त प्रहलाद को अग्नि में लेकर बैठ गई। और अग्नि जला दी गई।  अग्नि की लपटो ने  होलिका को जला दिया। और भक्त प्रहलाद फिर बच गए। अब तो हिरण्यकश्यप क्रोध से लाल अंगार हो गया। उसने अपनी तलवार निकाली। और कहा कि तुम्हें मैं ही मार देता हूँ।  जैसे ही तलवार से भक्त प्रहलाद को हिरण्यकश्यप  को चला । तभी एक खंभे को चीरते  हुए । विष्णु भगवान नरसिंह अवतार में  प्रकट हो गए। और हिरण्यकश्यप मारने  को हुए । तो वह विष्णु जी से बोला  मुझे ब्रह्मा जी का वरदान है। मुझे कोई भी सुबह दोपहर या रात्रि के पहर नहीं मार सकता है। तो विष्णु जी ने बोला ब्रह्मा जी के वरदान का मान  रखता हूँ। मैं तुम्हें  ना सुबह मारूंगा मार रहा हूँ।  ना दिन में मार रहा हूँ।  ना रात्रि  मे मार रहा हूँ। मैं शाम के पहर  मार रहा हूँ।  क्योंकि ब्रह्मा जी से वरदान मांगते समय वह तीन पहर का ही नाम लिया। चौथा पहर शाम का नाम लेना वह भूल गया था। और दूसरा वरदान घर के अंदर और बाहर मैं तुम्हें नहीं मार रहा हूँ। मैं तुम्हें घर और बाहर के बीच के दरवाजे पर मार रहा हूँ। ना तुम्हें धरती पर ना तुम्हें आकाश पर मार रहा हूँ।  और उन्होंने और नरसिंह भगवान  ने अपना  शरीर बढ़ाते  बड़ा रूप धारण किया और अपनी जांघ  पर लिटा कर अपने नुकीले नाखूनों से हिरण्यकश्यप सीने को फाड़  दिया। हिरण्यकश्यप की उस समय मृत्यु हो गई। और धरती को नरसिंह अवतार विष्णु जी ने पाप के बोझ से बचा लिया।  विष्णु भगवान की भक्ति से भक्त प्रहलाद बच गए। तब से प्राचीन काल से सच की विजय और भक्त की विजय पर और होलिका के जलने की खुशी मे  यह पर्व के रूप में मनाया  जाता है। होलिका दहन की परंपरा चली आ रही है।  आज भी फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होलिका दहन किया जाता है। अगले दिन रंगों के रूप में में होली का त्यौहार मनाया जाता है।